Tuesday, 21 July 2015

‘राष्ट्रीय उजाला’ एक्सक्लूसिव : विवेकानंद फाउंडेशन दे रहा है मोदी को अधिकारी

-मोदी सरकार के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी विचारधारा पर आधारित थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन के सामरिक व रणनीतिक मामलों पर इनपुट-
-सूची में बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रक्षा शोध और विकास संगठन के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत, अनुसंधान और विश्लेषण विंग के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला, पूर्व वायुसेना प्रमुख एसजी ईमानदार भी-
विभूति
नई दिल्ली। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्रा, पीके मिश्रा और अजीत मिश्रा मोदी सरकार बनने के तुरंत बाद ही केंद्र सरकार का अहम हिस्सा बन गए थे। नृपेंद्र मिश्रा प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रिंसिपल सेक्रेटरी बनाए गए थे। पीके मिश्रा एडिशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी के तौर पर जुड़े थे। अजीत डोभाल को देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे अहम पद पर बैठाया गया। यह तीनों अधिकारी रिटायरमेंट के बाद विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन से जुड़े थे। विवेकानंद फाउंडेशन आरएसएस आधारित विचारों का एक केंद्र है। संघ की विचाराधारा से जुड़े रहने वाले दर्जनों नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं। अब इनके बाद प्रकाश सिंह और अनिल बैजल के लिए मोदी सरकार में जगह तलाशी जा रही है। डोभाल के संस्था से हटने के बाद एनसी विज को वहां का निदेशक बनाया गया।
इस फाउंडेशन की खासियत यह है कि पूर्व नौकरशाह, पूर्व सैन्य अधिकारियों के अलावा ज्यादातर लोग यहां श्रम के रूप में दान करते हैं और इसके बदले कोई तनख्वाह नहीं लेते हैं।
दरअसल, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित एक ऐसा नियुक्ति केंद्र बन गया है, जहां मोदी सरकार के मनपसंद लोगों की पूरी टीम पहले से ही तैयार थी। धीरे-धीरे उन्हें सरकार में लगाया जा रहा है।
नृपेंद्र मिश्रा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद भरोसे का अधिकारी माना गया। उन्हें अहम जिम्मेदारी देते हुए पीएमओ में प्रिंसिपल सेक्रेटरी बनाया गया है। पीके मिश्रा को मोदी ने अपना एडिशनल सेक्रेटरी बनाया है। नृपेंद्र मिश्रा उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव भी रहे थे। उनके बारे में कहा जाता था कि मोदी के पसंद तो थे ही, साथ ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह के भी पसंद के हैं।
अंदर की बात यह है कि बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रक्षा शोध और विकास संगठन के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत, अनुसंधान और विश्लेषण विंग के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला, पूर्व वायुसेना प्रमुख एसजी ईमानदार की सूची तैयार है।
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में एक से बढ़कर एक दिग्गज हैं। बोर्ड में पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के पूर्व प्रमुख एके वर्मा, पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, थिंकर एस गुरुमूर्ति, भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलुरु के प्रोफेसर आर वैद्यनाथ, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार, जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा शामिल हैं।
विवेकानंद फाउंडेशन पर मोदी की नजर अनायास नहीं है। फाउंडेशन यूपीए सरकार की नाक में दम करने वाली गतिविधियों का केंद्र रहा है। परदे के पीछे तमाम योजनाएं इसी केंद्र में बनीं। जब सत्ताधारी कांग्रेस व यूपीए सरकार इशरत जहां मुठभेड़ मामले में नरेंद्र मोदी की घेराबंदी कर रही थी, उस वक्त अजीत डोभाल इशरत जहां केस में सबसे बड़े पैरोकार बने। उन्होंने इशरत जहां को लश्कर ए तैयबा का सदस्य बताकर घेराबंदी के राजनीतिक मोटिव पर सवाल उठाया। लालकृष्ण आडवाणी, गोविंदाचार्य, गुरुमूर्ति से लेकर संघ व भाजपा से जुड़े तमाम वरिष्ठ नेता व विचारक फाउंडेशन के विमर्श कार्यक्रम में शामिल होते रहे हैं।
 इन पर भी एक नज़र
नई दिल्ली के चाणक्यपुरी में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन को विवेकानंद केंद्र के नाम पर जमीन कांग्रेस के शासन काल में नरसिम्हा राव सरकार के दौरान मिली। भैरों सिंह शेखावत ने उपराष्ट्रपति के तौर पर 22 फरवरी 2004 को इस भवन का शिलान्यास किया था। दिसंबर 2009 में भवन का उद्घाटन माता अमृतानंद मयी और न्यायमूर्ति एमएन वैंकटचलैया ने किया था। फाउंडेशन के रिपोर्ट के मुताबिक आय का बड़ा स्रोत दान से प्राप्त राशि है। देश और विदेश से लोग इस संस्थान को अनुदान देते हैं। वर्ष 2013 में फाउंडेशन को एक करोड़ 49 लाख 56 हजार रुपये डोनेशन के तौर पर मिले। 2 लाख रुपए विदेश मंत्रालय से अनुदान में मिला। इसी साल मानदेय और वेतन पर 93 लाख 36 हजार से ज्यादा की राशि खर्च कर दी।

‘राष्ट्रीय उजाला’ एक्सक्लूसिव- हर साल गायब होते हैं एक लाख बच्चे : एनसीआरबी

-निठारी पार्ट–2 के रूप में सामने आया सीरियल रेपिस्ट रविंद्र
-बच्चों के गायब होने की शिकायतों पर गौर नहीं करती पुलिस
-‘भैंस’ और ‘कुत्ता’ खोजने में ज्यादा सक्रियता दिखाती है पुलिस
विभूति कुमार रस्तोगी
नई दिल्ली। सीरियल रेपिस्ट और हत्यारोपी रविंद्र देश का दूसरा सुरेंद्र कोली है। यानि रविंद्र को आप निठारी पार्ट-2 के तौर पर देख सकते हैं। जिस प्रकार नोएडा के निठारी गांव के मकान में सुरेंद्र कोली ने एक के बाद एक वर्षों तक मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाकर मारता रहा, ठीक उसी प्रकार से 9 साल बाद एक बार फिर देश के लोगों को निठारी कांड की याद जेहन में ताजा हो गई। निठारी कांड हो या फिर अभी रविंद्र कांड, सब में बच्चे और बच्चियां एक के बाद एक गायब होते रहे, लेकिन दर्जनों शिकायत के बाद भी पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। निठारी कांड उजागर होने के बाद मां-बाप को अपने बच्चे की मौत की जानकारी मिली, तो अब रविंद्र के गिरफ्तार होने के बाद ऐसे दर्जनों मां-बाप का दिल फट पड़ा, जिन्होंने अपने बच्चे के गुम होने की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई थी। मतलब यहां भी साफ है कि अब उनके बच्चे भी कभी लौट के नहीं आएंगे। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस ने बच्चों की गुमशुदगी की शिकायतों पर गौर क्यों नहीं किया। अगर पुलिस बच्चों के गायब होने पर मां-बाप की शिकायतों पर तत्परता दिखाती, तो शायद कुछ बच्चे मौत के गाल में समाने से बच सकते थे। लेकिन पुलिस को वीआईपी की शिकायतों के अलग और आम आदमी की शिकायतों पर गौर करने की फुर्सत ही कहां है। यूपी के कद्दावर मंत्री आजम खान की भैंस जब गायब हुई, तो पुलिस-प्रशासन का सारा अमला खोजबीन में जुट गया और खोज निकाला। दिल्ली पुलिस कमिश्नर रहे वाईएस डडवाल का कुत्ता गायब हुआ था, तो किस प्रकार पूरी दिल्ली पुलिस डडवाल के कुत्ते को खोजने में जुट गई थी और जल्द कुत्ता भी मिल गया। लेकिन भैंस और कुत्ते जैसा नसीब उन बच्चों को कहां जो गरीब घर में पैदा हुए थे।
नेशनल रिकार्ड क्राइम ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर गौर करें तो दिल दहल देने वाले नतीजे सामने आते हैं। हर साल देश भर से करीब 1 लाख बच्चे (लड़का-लड़की) गायब हो जाते हैं। कोई अपने घर के बाहर खेलते हुए उठा लिया जाता है, तो कोई स्कूल के आते-जाते वक्त। हर मामले में मां-बाप भाग कर थाने इस उम्मीद में जाते हैं कि शायद पुलिस तुरंत हरकत में आकर बच्चा खोज दे। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली की स्मार्ट पुलिस हो या बिहार, यूपी सहित देश के सभी राज्यों की पुलिस, सबका रवैया कमोवेश एक जैसा ही होता है। टालमटोल के कारण बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं।
एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि गायब हुए बच्चों में महज 30 से 40 फीसदी ही नसीब वाले होते हैं जो पुलिस, एनजीओ या किसी अन्य मदद से मिल जाते हैं। यानि हर साल 50 से 60 हजार बच्चे घर कभी भी लौट कर नहीं आते हैं।
निठारी गांव के लोगों ने भी बच्चों के गायब होने की शिकायत थाने में की, लेकिन पुलिस सभी शिकायतों को कूड़े के डिब्बे में फेंक दी थी। जब गांव वालों ने ही मामला पकड़ा, तो दिल दहला देने वाला अपराध सामने आया। सुरेंद्र कोली एक नर पिशाच की तरह बच्चों के साथ सेक्स करके मार डालता था। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि 9 साल बाद भी उसे आज तक फांसी पर नहीं लटकाया जा सका। अभी सुरेंद्र को फांसी भी नहीं हुई है कि इसी बीच निठारी पार्ट-2 भी सामने आ गया।
एक नज़र
डीयू के मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर नवीन कुमार का साफ तौर पर कहना है कि निठारी कांड, रविंद्र कांड सहित जघन्य बलात्कार कांड, देशद्रोह कांड, बम ब्लास्ट कांड में आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा होने के साथ दोषियों को फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए। अपराध का डर तभी होता है जब सजा पर त्वरित ऐक्शन लिया जाता है। नहीं तो हर अपराधी डर के वातावरण से बाहर ही रहेगा। उन्होंने कहा कि यह एक मनौवैज्ञानिक पहलू है कि जब तक आप डर पैदा नहीं करेंगे, तब तक अच्छे रिजल्ट अपराध की रोकथाम के मामले में सामने नहीं आएंगे।

‘राष्ट्रीय उजाला’ एक्सक्लूसिवः प्राधिकरण के खेल में उलझे किसान-बिल्डर

धरने पर बैठे किसान, प्रशासन की बात सुनने को नहीं तैयार
बिल्डर का दावा, जांच-पड़ताल के बाद प्राधिकरण से खरीदी थी भूमि
प्राधिकरण व प्रशासन के लिए सिरदर्द बने किसान।
प्रोजेक्ट तैयार है पर किसान नहीं लेने दे रहे निवेशकों को पजेशन
बिल्डर ग्रुप न्यायालय के आदेश को दे रहा अहमियत
निवेशकों से भयभीत न होने की अपील की।
-क्या है मामला-
भूमि अधिग्रहण के पुराने मामले में फंसा पेंच। निर्माण स्थल की जमीन को किसानों ने बताया अपनी। वहीं प्राधिकरण ने बताई बिल्डर की जमीन। अथारिटी के खेल में उलझे किसान और बिल्डर। भूमि की पैमाइश करने पर अड़े। अधिकारियों ने मानी मांग। मामले की सात अगस्त को होगी सुनवाई।
अश्वनी श्रीवास्तव
नोएडा। भारी संख्या में पुलिस बल, छावनी में तब्दील सिविटेक सोसायटी और गेट पर धरने पर बैठे सोरखा गांव के किसान। ऐसा ही कुछ नजारा है सेक्टर 77 स्थिति सिविटेक सोसायटी का। मामला भूमि अधिग्रहण का है। किसान बता रहे हैं कि जमीन हमारी है, जबकि आधिकारिक तौर पर यदि माने तो बिल्डर ने यह भूमि नोएडा प्राधिकरण से बिड के माध्यम से खरीदी थी। जो एक आधिकारिक तरीका होता है किसी भी प्रॉपर्टी को खरीदने का। बिल्डर का प्रोजेक्ट लगभग तैयार है। लोग भी आकर रहने शुरु हो गए हैं। ऐसे में अगर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो इसमें नुकसान किसी भी स्थिति में बिल्डर का ही होगा। शहर का प्रशासनिक अमला किसानों को समझाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन माहौल ऐसा है कि कोई कुछ समझने को ही राजी नहीं। मंगलवार को किसानों को समझाने पहुंचे नोएडा प्राधिकरण के तहसीलदार और पुलिस अधिकारियों द्वारा लाख समझाने के बाद किसान इस बात पर माने कि जमीन की पुन: पैमाइश की जाए और यदि भूमि बिल्डर की भूमि के दायरे में आती है, तो उसे तत्काल प्रभाव से सीज किया जाए और वह भूमि किसानों को दी जाए। किसानों की इस मांग पर प्रशासन की सहमति तो बन गई, लेकिन किसानों का कहना है कि वह गेट से तभी हटेंगे जब फैसला कागजों पर हो जाएगा, जबकि एक आरटीआई(14612) के जवाब में प्राधिकरण ने यह स्पष्ट किया है कि किसान की भूमि सिविटेक बिल्डर्स की लैंड में न होकर हरित पट्टी में है। गगनचुुंबी इमारतों से गुलजार नोएडा का सेक्टर-77 इन दिनों विवादों का केंद्र बना हुआ है। कारण किसानों द्वारा बिल्डर की साइट के कुछ हिस्से को अपनी भूमि बताना है। किसान अपनी बात पर अड़े हैं। प्रशासन हर मुमकिन कोशिश करके हार चुका है, लेकिन किसान धरने समाप्त करने को राजी ही नहीं है। किसान हाई कोर्ट के आदेश का हवाला दे रहे हैं, जबकि बिल्डर की माने तो न्यायालय ने उनकी तरफ से मसले पर रिकॉल प्रीटिशन (रिकॉल प्रीटिशन उस स्थिति में स्वीकार की जाती है, जब मामले में कोई तथ्य न्यायालय द्वारा छूट जाता है।) स्वीकार कर लिया है। बिल्डर ग्रुप की माने तो वह न्यायालय का फैसला जो भी आएगा उसे सर्व सम्मति से मानने को तैयार है, जबकि किसानों के विरोध में प्राधिकरण ने भी अदालत में एक एसपीएल दायर की हुई है। जिस पर बहस आगामी सात अगस्त को होना नियत है। प्राधिकरण अधिकारी भी न्यायालय के ही फैसले पर बल दे रहे हैं। ऐसे में किसानों की मनमानी से न सिर्फ वहां रहने वाले परिवार, बल्कि बिल्डर गु्रप को भी इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है।
-क्या है पूरा मामला-
नोएडा के सेक्टर-77 में सिविटेक बिल्डर का संपरिती नाम से एक प्रोजेक्ट लगभग तैयार स्थिति में है। किसानों की माने तो उसमें लोग भी आकर रहने लगे है। सोरखा गांव के देवी सिंह का आरोप है कि इस बिल्डर सोसायटी की खसरा संख्या 103/1 में 2503 मीटर जमीन उनकी है, जबकि न्यायालय के आदेश व प्राधिकरण की माने तो पूरी भूमि यानि 2503 मीटर के 1/5 वें हिससे के दावेदार हैं देवी सिंह। प्राधिकरण तो यहां तक कहता है कि देवी सिंह की भूमि सिविटेक के प्रोजेक्ट में न होकर वहीं पास में स्थिति ग्रीन बेल्ट में है। बिल्डर की माने तो किसान जिस न्यायालय के आदेश को आधार बना भूमि को अपना बता रहे हैं। मामले में कोर्ट ने उसे कोई नोटिस नहीं भेजा बल्कि जो भी उत्तर देने को कहा गया है। प्राधिकरण को ही लिखित आदेशों में तलब किया गया है। बिल्डर की माने तो मामले में उसकी जवाबदारी नहीं बनती है। यदि कोर्ट बिल्डर से कोई लिखित संवाद करती है, तो वह न्यायालय को इसका संज्ञान पूर्ण तथ्यों के साथ अवश्य देता। जिससे आज ऐसी स्थिति न उत्पन्न होती। वहीं मामले पर प्रशासन के चक्कर काटते-काटते थक चुके किसानों ने स्थानीय प्रशासन के आला अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय में दूसरी रिट न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की भी डाल दी है। किसान यह भी आरोप लगाते हैं कि आस-पास बनी कई बिल्डर सोसायटियों में भी बिल्डरों ने किसानों की जमीन प्राधिकरण की मिलीभगत से जबरन कब्जा रखी है।
-क्या कहते हैं किसान-
किसानों की माने तो प्राधिकरण अधिकारी अक्सर बिडिंग के समय बिल्डरों से पैसा लेकर उन्हें धोखे से किसानों की वह जमीन भी दे देते हैं, जिसका हक असल में किसान के पास है। वह यह भी कहते हैं कि प्राधिकरण अधिकारी इससे पैसा तो कमा लेता हैं, लेकिन बिल्डर और किसान जीवन भर न्यायालय के चक्कर काटते रहते हैं। ऐसा ही सिविटेक के सेक्टर 77 स्थ्तिि संपरिती प्रोजेक्ट में भी हुआ है। देवी सिंह आरोप लगाते हुए यह मांग कर रहे हैं कि बिल्डर ने उनकी जमीन हड़प ली। उनको गांव के ही अन्य किसानों का समर्थन भी मिला है। देवी कहना है कि जब तक प्रशासन उन्हें उनकी जमीन नहीं दे देता तब तक वह बिल्डर साइट से नहीं हटेंगे।
-क्या कहता है प्राधिकरण-
नोएडा प्राधिकरण के तहसीलदार संजय मिश्रा का कहना है कि बिल्डर प्रोजेक्ट में कहीं भी किसानों की जमीन नहीं है यह साफ कर दिया गया है। यदि फिर भी किसानों को संतुष्टि नहीं है, तो हम पुन: भूमि की पैमाइश किसानों के अनुरूप कराने को तैयार है, लेकिन इसके लिए उन्होंने मौके पर पहुंच किसानों से बिल्डर साइट से धरना खत्म करने की भी अपील की है। लाख कोशिशों के बाद भी किसान मौके से हटने को तैयार ही नहीं है। मिश्रा यह भी बताते हैं कि जब किसानों ने न्यायालय का सहारा अपनी इस लड़ाई के लिए लिया है, तो वह स्वंय क्यों कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। न्यायालय के फैसले का इंतजार करें। यदि इसमें कहीं भी उनका हक होगा तो उन्हें दिया जाएगा। प्राधिकरण ने मामले पर कोर्ट में एसपीएल डाल रखी है जिसपर सुनवाई आगामी सात अगस्त को है। प्राधिकरण की गलती का खामियाजा भुगत रहे बिल्डर गु्रप के लिए किसान एक बड़ी समस्या बन उनके प्रोजेक्ट पर बैठे हुए है। बिल्डर की माने तो आरोप निराधार है, लेकिन हम फिर भी अपने निवेशकों से अपील करते हैं कि उन्हें भयभीत होने की जरूरत नहीं है। हम आखिरी हद तक लड़ेंगे और जीत हमारी ही होगी। हमने भूमि का एक-एक इंच जांच कर खरीदा है। हमें न्यायालय अनदेखा नहीं कर सकती है। फैसला तो कोर्ट सुनाएगी पर सवाल यही खड़ा होता है कि क्या प्राधिकरण अधिकारी किसी भी बिडिंग से पहले भूमि की पूरी पड़ताल नहीं करते। जिससे ऐसे हालात उत्पन्न होते हैं।
-क्या कहता है बिल्डर ग्रुप-
सिविटेक बिल्डर गु्रप के एजीएम डीएस राणा की माने तो यह भूमि उन्होंने प्राधिकरण बिडिंग में ली थी। जब उन्होंने भूमि खरीदी थी उस समय गहनता से सारे पेपर चेक किए थे। रिकॉर्ड मेंं कहीं भी देवी सिंह का नाम नहीं था। राणा कहते हैं कि यदि किसानों को कोई आपत्ति है, तो वह आधिकारिक तौर पर प्राधिकरण से जा कर लड़े। हमने तो उनकी ही तरह जमीन प्राधिकरण से ही ली है। किसान हमसे ऐसे क्यों पेश आ रहे हैं। राणा ने बातचीत के दौरान यह भी बताया कि यह तो किसानों का रोज काम हो गया है। जब भी किसी बिल्डर का प्रोजेक्ट तैयार हो जाता है, तो वह रंगदारी मांगने के माफिक उसके द्वार पर ऐसे ही मनमाने तरीके से धरने पर बैठ जाते हैं। राणा कहते है कि हमारे प्रोजेक्ट में एक इंच भूमि भी किसानों की नहीं है। किसी भी निवेशक को डरने की कोई जरूरत नहीं है।

Monday, 20 July 2015

पिछले 5 वर्षों में सोना हुआ सबसे सस्ता, 10 ग्राम का भाव 25 हजार से भी कम

नई दिल्लीः अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने के दाम में आई गिरावट के बाद भारतीय बाज़ार में सोने का भाव गिरकर 5 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। 10 ग्राम का भाव 25 हजार से भी कम हो गया है। दूसरी तरफ से प्लेटिनम का दाम भी 2009 के स्तर पर पहुंचा गया है। विदेशी बाजार में सोना पांच साल के सबसे कम कीमत पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोना शुक्रवार को पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गया। न्यूयॉर्क में कीमत 1,129.60 डॉलर प्रति औंस तक गिर गई। यह अप्रैल 2010 के बाद अब सोना सबसे कम स्तर पर है। इस गिरावट का असर घरेलू बाजारों पर भी हुआ। सोना पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है।
सोना स्टैंडर्ड के दामों में 150 रुपए की गिरावट आई. यह 25,950 रु. प्रति 10 ग्राम रहा। जेवराती (22 कैरेट) 24,700 रु. प्रति 10 ग्राम हो गया है। इससे पहले 18 मार्च 2015 को सोना स्टैंडर्ड 25,900 रु और सोना जेवराती 24,700 रुपए प्रति दस ग्राम के स्तर पर आ गया था। सोने की साथ ही प्लेटटिनम के दाम में भी पांच फीसदी घटी है। चांदी के दाम भी कम हुई है। इसकी कीमत 300 रुपए घटकर 34,500 रुपए प्रति किलो हो गई है।

बस्सी का केजरीवाल पर तंज, कहा- हवाबाजी से नहीं चलती पुलिस!

नई दिल्ली। पिछले दो दिनों से मिनाक्षी की हत्या को लेकर सीएम केजरीवाल और दिल्ली पुलिस के बीच तनातनी जारी है। पहले केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया फिर दिल्ली पुलिस कमिश्नर को मिलने के लिए बुलाया। वहीं आज एलजी से मिलने के बाद दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी ने एक बार फिर केजरीवाल पर तंज कसा और कहा कि हवाबाजी से पुलिस नहीं चलती बल्कि कानून से काम होता है।
गौरतलब है कि 2 दिन पहले दिनदहाड़े दो युवकों ने मीनाक्षी नाम की लड़की की बेरहमी से हत्या कर दी थी, जिसके बाद से ही इस मसले पर सियासत हो रही है। पहले सीएम केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस को ठुल्ला कहा और इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। वहीं बीजेपी आप पर हमला बोल रही है।

जेटली ने किया आगाह : निवेश रुका तो रोजगार पर खतरा

नयी दिल्ली। श्रमिक संगठनों द्वारा श्रम सुधारों का विरोध किये जाने के बीच वित्त मंत्री अरण जेटली ने आज आगाह किया कि यदि निवेश प्रवाह रका तो रोजगार सृजन पर खतरा होगा। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे विचारों पर जोर नहीं देने की अपील की जिससे कि आर्थिक गतिविधियों को नुकसान पहुंचे।
जेटली ने कहा कि आर्थिक गतिविधियां बढ़ाये बिना श्रम बल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। गौरतलब है कि प्रस्तावित श्रम सुधारों को लेकर वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय समिति की श्रमिक संगठनों के साथ बातचीत गतिरोध दूर करने में असफल रही। वित्त मंत्री ने यहां 46वें भारतीय श्रम सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा ‘‘यदि हम निवेश प्रवाह रोकते हैं तो रोजगार नहीं बढ़ेगा और फिर आर्थिक गतिविधियां भी नहीं बढ़ेगी। जिसके बाद यह मौजूदा रोजगारों के लिए खतरा बन जायेगा।’’ वित्त मंत्री ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है जबकि अन्य में ज्यादातर चुनौती का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा ‘‘सरकार की कोशिश है कि जब पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी है, तब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत रहे। आज हमें इस बात पर गर्व है कि ऐसी नरमी भरे माहौल में जब सभी देश संघर्ष कर रहे हैं भारत दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले अधिक तेजी से वृद्धि दर्ज कर रहा है।’’

गतिरोध दूर नहीं कर पायी सर्वदलीय बैठक

नयी दिल्ली। संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव तय नजर आ रहा है क्योंकि मानसून सत्र के एक दिन पहले बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में ललित मोदी और व्यापम घोटाले से जुडे विवादों को लेकर गतिरोध आज दूर नहीं हुआ । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी मुद्दों पर चर्चा की पेशकश की है।
सरकार ने किसी के भी इस्तीफे की संभावना से साफ इंकार कर दिया । संसदीय कार्य मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि किसी का अल्टीमेटम स्वीकारने का सवाल ही नहीं उठता । इस्तीफे का सवाल कहां से पैदा होता है ? सरकार की ओर से किसी केन्द्रीय मंत्री ने कोई गैर कानूनी या अनैतिक कार्य नहीं किया है ।
नायडू विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दे रहे थे कि प्रधानमंत्री मोदी यदि संसद का मानसून सत्र सुचारू रूप से चलाना चाहते हैं तो उन्हें विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके पदों से हटाना चाहिए । इस बीच प्रधानमंत्री ने राजनीतिक पार्टियों को याद दिलाया कि संसद को सुचारू रूप से चलाना साझा जिम्मेदारी है हालांकि सरकार को इसकी पहल करनी चाहिए । उन्होंने राजनीतिक दलों से सभी मुद्दों पर चर्चा का संसद के समय का सदुपयोग करने की अपील की । भूमि विधेयक पर प्रधानमंत्री ने सपा नेता राम गोपाल यादव की टिप्पणी से सहमति जतायी कि इस मुद्दे पर कोई आम सहमति नहीं है इसलिए इस मुददे के समाधान के लिए सरकार और विपक्ष को कुछ सामंजस्य बिठाना चाहिए ।